Friday, February 7, 2020

साख नियंत्रण क्या है ? केंद्रीय बैंक द्वारा साख नियंत्रण कैसे किया जाता है?

केंद्रीय बैंक द्वारा साख नियंत्रण

भारत का केंद्रीय
 साख नियंत्रण क्या है ? केंद्रीय बैंक द्वारा साख नियंत्रण कैसे किया जाता है? बैंक भारतीय रिजर्व बैंक है भारतीय रिजर्व बैंक का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य साख का नियंत्रण कर साख नियंत्रण क्या है ? केंद्रीय बैंक द्वारा साख नियंत्रण कैसे किया जाता है? ना है। साख नियंत्रण से तात्पर्य है कि देश में साख की पूर्ति ना तो आवश्यकता से कम हो और ना ही अधिक
यदि साख की पूर्ति आवश्यकता से अधिक हो या कम होती है तो दोनों ही परिस्थितियों में देश की अर्थव्यवस्था का संचालन सुचारु रूप से नहीं हो पाता है अतः आरबीआई इस तरह से साख नियंत्रण करता है कि देश में 'स्थिरता के साथ आर्थिक विकास' हो सके। इसका तात्पर्य यह है कि रिजर्व बैंक एक ओर तो आर्थिक विकास की गति मेंं  तीव्रता लाने व उसे उच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए वास्तविक राष्ट्रीय आय में हुई वृद्धि के अनुरूप मुद्रा पूर्ति मेंं वृद्धि करता है वहीं दूसरी और यह भी ध्यान रखता है कि देश में मुद्रास्फीति में वृद्धि ना हो पाए ताकि अर्थव्यवस्था में वांछित स्थिति बनी रहे रिजर्व बैंक अपनी साख नियंत्रण नीति के द्वारा आर्थिक विकास को वांछित दिशा में प्रोत्साहित करता है।
             साख नियंत्रण की विधियां
भारतीय रिजर्व बैंक साख नियंत्रण की कई विधियो को प्रयोग करता है अध्ययन की दृष्टि से साख नियंत्रण की प्रमुख विधियों को दो भागों में बांटा जा सकता है।

1. साख नियंत्रण की परिणात्मक विधियां
2. गुणात्मक विधियां


परिणात्मक विधियां साख की मात्रा तथा उसकी लागत को कम करती है, जबकि गुणात्मक विधियांं साख के प्रयोग तथा व्यवहार को नियंत्रित करती है।
   
    1.साख नियंत्रण की परिमाणात्मक विधियां

1.बैंक दर- बैंक दर वह दर होती है जिस पर देेश का केंद्रीय बैंक (भारत में आरबीआई) प्रथम श्रेणी की प्रतिभूतियोंं तथा अनुमोदित ऋण - पत्रो की जमानत 

के आधार पर  व्यापारिक बैंको को ऋण प्रदान करता है। भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 49 के अनुसार उधर व प्रमाण इधर है जिस पर यह आरबीआई ऐसे विनिमय विलो या व्यापारिक पत्रों का श्रेया पुनर कटौती करने को तैयार रहता है जो कि इस अधिनियम के अंतर्गत क्रय किए जा सकते हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक अपनी बैंक दर नीति के द्वारा साख मुद्रा की मात्रा वह उसकी लागत पर प्रभाव डालकर देश में साख मुद्रा का नियमन करता है साथ नियंत्रण की यह विधि तभी प्रभाव कारी होगी जबकि देश में संगठित मुद्रा बाजार हो तथा वाणिज्य बैंक साख हेतु रिजर्व बैंक पर निर्भर करें।

        देश की परिस्थितियों के अनुरूप रिजर्व बैंक सस्ती अथवा महंगी साथ नीति अपनाता है यदि देश में साख की मात्रा में वृद्धि करनी होती है तो रिजर्व बैंक बैंक दर में कमी करता है इसे सस्ती साथ नीति कहते हैं बैंक दर में कमी से साख की लागत तथा ब्याज दर में कमी आती है परिणाम स्वरूप की मात्रा में वृद्धि होती है इसके विपरीत यदि देश में साख की मात्रा में कमी करनी होती है तो आरबीआई बैंक दर में वृद्धि कर देता है इसे महंगी साथ नीति कहते हैं।

         भारत में बैंक दर नीति की क्रियाशीलता रिजर्व बैंक ने अपनी स्थापना के समय 3.5% बैंक दर निश्चित की 

थी जिसे 15 नवंबर 1934 को घटाकर 3% कर दिया सन 1951 तक यह दर 3% पर ही स्थिर रही दूसरे शब्दों में रिजर्व बैंक ने इस अवधि में सुलभ अथवा सस्ती मुद्रा नीति का अनुसरण किया 15 नवंबर 1951 से बैंक दर पुनः 3.5% कर दी गई रिजर्व बैंक ने 1951 से लेकर वर्तमान समय तक बैंक दर में अनेक बार परिवर्तन किए हैं।

     देश में दहाई के अंक से अधिक मुद्रास्फीति को रोकने के लिए रिजर्व बैंक ने 1991 में बैंक दर में दो बार वृद्धि की 3 जुलाई 1991 को कारोबार की समाप्ति से बैंक दर को 10% से बढ़ाकर 11% किया गया रिजर्व बैंक समय समय पर इस में परिवर्तन करता रहता है 30 अप्रैल 2003 से इसे पुणे घटाकर 6% कर दिया गया वर्तमान (5 फरवरी, 2018) से बैंक दर 6.25% है।

         हमारे देश में बैंक दर नीति अधिक सफल नहीं रही है मुद्रा नीति अपनाने के बावजूद भारत में मुद्रास्फीति में कमी नहीं आई है भारत में बैंक दर बाजार दरों को प्रभावित करने में असमर्थ रही है क्योंकि बैंक दर बाजार दरों का नेतृत्व करने की बजाय उनका अनुसरण करती है।

2.- खुले बाजार की क्रियाएं खुले बाजार की क्रियाएं से तात्पर्य केंद्र बैंक द्वारा साख नियंत्रण के उद्देश्य सरकारी प्रतिभूतियों प्रथम श्रेणी के बिलों पर प्रतिज्ञा पत्रों के क्रय-विक्रय से है। रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 71 (8) के अनुसार यह बैंक आरबीआई केंद्रीय अथवा राज्य सरकारों अथवा किसी समाज संस्था की प्रतिभूतियों करें कर सकता है यह प्रतिभूतियां किसी भी अवधि की हो सकती है इसके अतिरिक्त धारा 17 (2)(A) के अनुसार रिजर्व बैंक को अल्पकालीन बिलो के क्रय विक्रय का अधिकार प्राप्त है।


           भारतीय रिजर्व बैंक खुले बाजार की क्रियाओं को बैंक दर की पूरक विधि के रूप में प्रयुक्त करता है अब रिजर्व बैंक साख की मात्रा अथवा उसमें वृद्धि पर अंकुश लगाना चाहता है तो वह खुले बाजार में प्रतिभूतियों की बिक्री करता हैपरिणाम स्वरुप व्यापारिक बैंकों में जनता की क्रय शक्ति रिजर्व बैंक के पास आ जाती है इसके विपरीत जब मुद्रा पूर्ति में वृद्धि करनी होती है तो वह रिजर्व बैंक जनता एवं वाणिज्य बैंकों से प्रतिभूतियों का क्रय करता है इससे वाणिज्य बैंकों की तरलता व ऋण ऋण देने की क्षमता में वृद्धि होती है।
   
           रिजर्व बैंक ने साख नियंत्रण के उद्देश्य खुले बाजार की क्रियाओं का सीमित उपयोग किया है बैंक ने प्राइस सरकार की रणनीति को सफल बनाने अथवा सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्यों में स्थिरता बनाए रखने के लिए इस विधि का प्रयोग किया है बैंक को की साख की मौसमी आवश्यकता की पूर्ति के लिए इसका नियमित रूप से उपयोग किया गया है।

3. नकद कोष अनुपात में परिवर्तन- भारतीय रिजर्व बैंक अनुसूचित बैंकों के नगद कोष अनुपात में परिवर्तन करके भी साख का नियंत्रण करता है आरबीआई अधिनियम 1934 की धारा (42)(1) में यह व्यवस्था की गई थी कि प्रत्येक अनुसूचित बैंकों को रिजर्व बैंक के पास अपनी समय जमाव का 2% तथा मांग जमाव का 5% नगद कोशो के रूप में रखना पड़ेगा रिजर्व बैंक अधिनियम में 15 सितंबर 1962 को किए गए संशोधन के परिणाम स्वरूप प्रत्येक अनुसूचित बैंकों को अपनी कुल जमाव का 3% आरबीआई के पास जमा कराना अनिवार्य कर दिया गया इस संशोधन के अंतर्गत रिजर्व बैंक को यह अधिकार दे दिया गया कि यदि वह चाहे तो नगद कोष अनुपात को 15% तक बढ़ा सकता है इस प्रकार अनुसूचित बैंकों को अपनी कुल जमाव की 35 से 15% राशि को नगद रूप में रिजर्व बैंक के पास रखना पड़ता है रिजर्व बैंक ने समय-समय पर साख नियंत्रण के उद्देश्य बैंकों के नगद कोष अनुपात में परिवर्तन किया है 31 जुलाई 1988 को नगद कोष अनुपात बढ़ाकर 11% कर दिया गया 1 जुलाई 1989 से अनुपात बढ़ाकर 15% कर दिया गया वर्तमान में यह 5 फरवरी 2018 को यह 4% है।

    4. वैधानिक तरलता अनुपात में परिवर्तन भारतीय बैंकिंग नियमन अधिनियम 1949 की धारा 24 के अनुसार अनुसूचित बैंकों के अपनी कुल जमाव का कम से कम 20% तरल रूप में रखना अनिवार्य किया गया था एक्शन के द्वारा सन् 1962 में  को S.L.R बढ़ाकर 25% कर दिया गया इसके बाद इसमें समय-समय पर वृद्धि की गई 22 सितंबर 1990 को प्रारंभ हुए पखवाड़े में विधिक जलनिधि अनुपात को शुद्ध मांग और मियादी नियंत्रण की दृष्टि से बैंक इसमें समय-समय पर परिवर्तन करता रहता है 21 अक्टूबर 1947 से इसे 25% कर दिया गया वर्तमान (5 फरवरी 2018) में यह 19.5% है यह राशि प्रत्येक बैंक को तरलता बनाए रखने के लिए अपने पास रखनी होती है।

           2.साख नियंत्रण की गुणात्मक विधियां    
        
      रिजर्व बैंक साख के प्रयोग वितरण तथा दिशा को प्रभावित करने के लिए साख नियंत्रण की गुणात्मक विधियों को अपनाता है भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम की धारा 21 के अंतर्गत रिजर्व बैंक को ऋण की दशा तथा मात्रा के नियमन का पूरा अधिकार प्राप्त है गुणात्मक साख नियंत्रण का उद्देश्य विभिन्न उपयोगों पर निर्धारित प्राथमिकताओं वह लक्ष्यों के अनुकूल निर्णय नियंत्रण करना होता है भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर गुणात्मक साख नियंत्रण की निम्नलिखित विधियों को अपनाता है।

      1. चयनित अथवा प्रवर्तते साख नियंत्रण- बैंकिंग नियमन अधिनियम की धारा 361 के अंतर्गत आरबीआई को अधिकार प्राप्त है कि वह सभी बैंकिंग कंपनियों को अथवा किसी एक बैंकिंग कंपनी को किसी विशेष लेन देन अथवा विशिष्ट श्रेणी के लेनदेन की मना ही कर सकता हैअथवा इस बारे में सावधानी रखने का निर्देश दे सकता है चयनात्मक नियंत्रण के निमित्त उद्देश्य होते हैं
चयनात्मक साख नियंत्रण के निम्नलिखित रुप है:
A भिन्न-भिन्न कटौती दरें- रिजर्व बैंक विभिन्न क्षेत्रों के विनिमय बिलों की पुनर कटौती की भिन्न-भिन्न दरे अपनाता है। जिस क्षेत्र की साख की मात्रा में वृद्धि करनी होती है उसके विनिमय बिलों की पुनर कटौती नीची दर पर की जाती है इसके विपरीत आरबीआई जिस क्षेत्र की साख हतोत्साहित करना हो चाहता है उसके बिलों की पुनर कटौती दर ऊंची रखी जाती है अथवा पुनर कटौती की सुविधा स्थगित कर दी जाती है।

B. पुनर्वित्त सुविधाओं को वापस लेना -भारतीय अर्थव्यवस्था में आए गंभीर मुद्रा स्पीति जन दबाव के संदर्भ में मुद्रा प्रसार पर नियंत्रण रखे जाने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए आरबीआई कुछ वस्तुओं पर पुनर्वित्त सुविधा समाप्त कर सकता है।

C ऋण जमा अनुपात निश्चित करना- कई बार रिजर्व बैंक किसी विशेष क्षेत्र को दिए जाने वाले ऋण तथा जमा को अनुपात निश्चित करके चयनात्मक  साख नियंत्रण करता है ऐसे साख पर नियंत्रण लग जाता है।

D. कतिपय क्षेत्रों को ऋण दिए जाने पर प्रतिबंध- रिजर्व बैंक कतिपय क्षेत्रों को नीड दिए जाने पर प्रतिबंध भी लगा सकता है मुद्रास्फीति जननी दबाव और बैंकों के संसाधनों पर दबाव के संदर्भ में कुछ क्षेत्रों को ऋण देने पर प्रतिबंध लगा सकता है जैसे टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं के लिए ऋण इससे साख की मात्रा कम हो जाती है आरबीआई इसमें आवश्यकता अनुसार परिवर्तन कर सकता है।

     E. मूल्यांकन का निर्धारण- आवश्यक उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि को रोकने के लिए रिजर्व बैंक माल की जमानत पर व्यापारियों को वाणिज्य बैंकों द्वारा दिए जाने वाले ऋण की सीमा का निर्धारण कर देता है मार्जिन या मल्यांतर जितना अधिक होता है व्यापारियों को उतना ही कम ऋण मिलता है।

     F. आयात पूर्व जमा- इस विधि का उपयोग आया तो को हतोत्साहित करने के लिए किया जाता है इसके अंतर्गत आयातक को माल के आयात से पहले ही उसका मूल्य जमा कराने का आदेश दिया जाता है आरबीआई के द्वारा

        G. साख की राशनिंग- साख नियंत्रण किस विधि के अंतर्गत रिजर्व बैंक वाणिज्य बैंक को वाणिज्य बैंकों द्वारा दी जाने वाली कुछ सांख की विभिन्न उद्योगों क्षेत्रों एवं व्यवसायियों के बीच राशनिंग वितरण कर देता है उदाहरण के लिए रिजर्व बैंक ने वाणिज्य बैंकों को स्पष्ट आदेश दे रखा है कि वह कुल रनों का एक निश्चित भाग अनिवार्यता प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों को देंगे।

       H.पूर्व अनुमति से ऋण- रिजर्व बैंक वाणिज्य बैंकों को स्पष्ट निर्देश देकर पाबंद कर सकता है कि वह उसकी पूर्व अनुमति से बिना किसी उद्देश्य विशेष के लिए ऋण नहीं दे।

     I. नैतिक अनुनय- साख नियंत्रण के लिए रिजर्व बैंक वाणिज्य बैंकों पर अपने नैतिक प्रभाव का उपयोग करता है रिजर्व बैंक अनुसूचित बैंकों को समझा-बुझाकर अपनी साख नियंत्रण की नीति का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है नैतिक दबाव पर चार विज्ञापन आदि के माध्यम से रिजर्व बैंक समय-समय पर व्यापारिक बैंकों को परामर्श देता है कि किसे और कितना ऋण देना है अथवा नहीं देना हैरिजर्व बैंक अपने विभिन्न प्रकाशनों गस्ती पत्रों प्रेस कॉन्फ्रेंस तथा बैंक प्रतिनिधियों की बैठकों के माध्यम से वाणिज्य बैंकों के साथ नियंत्रण के लिए नैतिक अनुनय करता है।

        J. प्रत्यक्ष कार्यवाही बैंकों द्वारा भारतीय बैंक कि साथ नियंत्रण की सलाह ना मानने पर रिजर्व बैंक को प्रत्यक्ष कार्रवाई करने का अधिकार प्राप्त है रिजर्व बैंक के आदेशों की अवहेलना करता है तो वह प्रत्यक्ष कार्यवाही के जरिए उस बैंक की रेट देने की क्रियाओं पर रोक लगा सकता है वित्तीय अनियमितताओं के कारण मई 1992 में बैंक ऑफ कराड को बंद करने का निर्णय तथा मेट्रोपोलिस को ऑपरेटिव बैंक के कामकाज पर प्रतिबंध लगाने का प्रत्यक्ष कार्यवाही के स्पष्ट उदाहरण थे बैंक लिमिटेड प्रतिभूति घोटाले में उसकी भूमिका के कारण बंद कर दिया गया है।

      तो दोस्तो इस प्रकार से Rbi साख की मात्रा को नियत्रित करता है आप लोगो को कैसी लगी मेरी ये पोस्ट अगर आप कुछ पुछना चाहते है या और किसी बैंक के बारे में जानना चाहते है या मुझको कोई सलाह देना चाहते है तो आप कृपया कॉमेंट बॉक्स में अपनी राय लिखे 

बहुत बहुत शुक्रिया अपना कीमती समय देने के लिए 

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